हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित पशु-पक्षियों के प्रति मानवीय संवेदना और गुरुदेव टैगोर का संस्मरण
'एक कुत्ता और एक मैना' आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखित एक भावपूर्ण निबंध (Essay) है। इस पाठ में उन्होंने 'शांतिनिकेतन' के दिनों की यादें साझा की हैं और बताया है कि कैसे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर मूक (बेजुबान) प्राणियों की भावनाओं को भी गहराई से समझते थे।
जब गुरुदेव शांतिनिकेतन की भीड़भाड़ से बचने के लिए श्रीनिकेतन (पुराने मकान) में रहने चले गए, तो एक दिन उनका कुत्ता बिना किसी के बताए, रास्ता खोजता हुआ वहाँ पहुँच गया। उसे किसी ने रास्ता नहीं दिखाया था, यह उसका आत्मनिवेदन (Self-surrender) और प्रेम था।
कुत्ते की इस वफादारी को देखकर गुरुदेव ने एक कविता लिखी थी। उन्होंने कहा कि इस मूक प्राणी की आँखों में एक ऐसा करुण भाव है जो अपना सब कुछ न्योछावर कर देने का संदेश देता है। यह कुत्ता मनुष्य के भीतर छिपे 'मनुष्यत्व' को पहचानता है।
लेखक (द्विवेदी जी) मैना को हमेशा एक खुश और लड़ाकू पक्षी मानते थे। लेकिन एक दिन गुरुदेव ने एक लँगड़ी मैना की ओर इशारा करते हुए कहा - "देखते हो, यह यूथभ्रष्ट (झुंड से अलग) है। रोज यहाँ फुदकती है। इसके चेहरे पर कैसा करुण भाव है।"
गुरुदेव के कहने के बाद, जब लेखक ने ध्यान से देखा, तो उन्हें भी उस मैना के चेहरे पर दुख और दर्द दिखाई देने लगा। पहले वे उसे केवल एक साधारण पक्षी समझते थे, लेकिन गुरुदेव की संवेदनशील दृष्टि ने उन्हें पक्षियों के दुख को देखना सिखाया।
| सामान्य दृष्टि (लेखक पहले) | गुरुदेव की दृष्टि |
|---|---|
| पशु-पक्षी केवल मनोरंजन या भोजन के लिए हैं। | पशु-पक्षी भी संवेदनशील प्राणी हैं, उनमें भी आत्मा है। |
| मैना एक खुश और झगड़ालू पक्षी है। | उस अकेली मैना के चेहरे पर गहरा दुख (करुण भाव) है। |
| कुत्ता केवल एक जानवर है। | कुत्ता "पूर्ण मानव" (ईश्वर) को देख सकता है। |
लेखक अंत में बताते हैं कि एक दिन वह लँगड़ी मैना गायब हो गई (शायद मर गई)। लेखक कहते हैं कि हमें पक्षियों का दुख तब तक नहीं दिखता जब तक कोई महामानव (जैसे गुरुदेव) हमें दृष्टि न दे। इसके विपरीत, कौए सुबह-सुबह "काँव-काँव" करते हैं, लेकिन हम उनका दुख नहीं समझते।
यह पाठ हमें सिखाता है कि प्रेम की कोई भाषा नहीं होती। मनुष्य और पशु-पक्षियों का रिश्ता भावनाओं पर आधारित होता है। हमें बेजुबान प्राणियों के प्रति संवेदनशील और दयालु होना चाहिए।
प्रश्न: गुरुदेव ने शांतिनिकेतन को छोड़ कहीं और रहने का मन क्यों बनाया?
उत्तर: गुरुदेव का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था और शांतिनिकेतन में दिन भर मिलने वालों की भीड़ लगी रहती थी, जिससे उन्हें आराम नहीं मिल पाता था। इसलिए शांति और एकांत पाने के लिए वे श्रीनिकेतन चले गए।
प्रश्न: "इस बेचारी के मुख पर कैसा करुण भाव है" - यह वाक्य किसने, किसके लिए और क्यों कहा?
उत्तर: यह वाक्य गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने एक लँगड़ी मैना के लिए कहा। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि वह मैना अपने झुंड से अलग अकेली रहती थी और लँगड़ा कर चलती थी, जिससे उसका दुख झलक रहा था।
• आरोग्य: स्वास्थ्य/रोगमुक्त होना
• युथभ्रष्ट: अपने समूह/झुंड से भटका हुआ
• मूक: जो बोल न सके (बेजुबान)
• प्रगल्भ: चतुर/वाचाल
• परितृप्ति: पूरी तरह संतुष्टि