हरिशंकर परसाई द्वारा रचित एक व्यंग्य जो दिखावे की संस्कृति पर चोट करता है
'प्रेमचंद के फटे जूते' हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित एक निबंध है। इस पाठ में लेखक ने मुंशी प्रेमचंद के एक चित्र (Photo) के माध्यम से समाज में व्याप्त दिखावे की प्रवृत्ति (Show-off) और अवसरवादिता पर करारा व्यंग्य किया है।
यह पाठ दो विचारधाराओं का टकराव है: एक तरफ प्रेमचंद हैं जो वास्तविकता में जीते हैं और 'पर्दे' (छिपाने) में विश्वास नहीं करते। दूसरी तरफ आज का समाज है जो अपनी कमियों को छिपाने के लिए बाहरी चमक-दमक का सहारा लेता है।
लेखक देखते हैं कि प्रेमचंद के बाएँ पैर का जूता आगे से फटा हुआ है, जिससे उनकी अँगुली बाहर निकल आई है। इसके बावजूद प्रेमचंद के चेहरे पर एक बेपरवाह और व्यंग्य भरी मुस्कान है। उन्हें अपने फटे जूते को लेकर कोई शर्म या संकोच नहीं है।
| पहलू | प्रेमचंद (महान कथाकार) | लेखक (आम आदमी/समाज) |
|---|---|---|
| जूते की स्थिति | जूता ऊपर से फटा है, अँगुली दिख रही है। | जूता नीचे (तले) से फटा है, अँगुली ढकी है। |
| पैर की स्थिति | पैर सुरक्षित है, बस अँगुली दिख रही है। | तलवा घिस रहा है, पैर लहूलुहान हो रहा है। |
| मानसिकता | दिखावे में विश्वास नहीं, यथार्थवादी। | इज्ज़त (पर्दे) को बचाने के लिए कष्ट सहना। |
| परिणाम | वे समाज की बुराइयों को ठोकर मारते हैं। | समाज बुराइयों से समझौता करता है। |
पाठ में 'टीला' सामाजिक कुरीतियों, अन्याय, भेदभाव और शोषण का प्रतीक है। ये वे मुसीबतें हैं जो जीवन के रास्ते में आती हैं।
लेखक अनुमान लगाते हैं कि प्रेमचंद का जूता इसलिए फटा क्योंकि उन्होंने रास्ते में आए किसी सख्त 'टीले' (सामाजिक बुराई) पर बार-बार ठोकर मारी होगी। उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला, बल्कि मुसीबत से टक्कर ली, जिसके कारण उनका जूता ऊपर से फट गया।
लेखक कहते हैं कि हम (समाज के लोग) टीले से बचकर, किनारे से निकल जाते हैं। हम अपना 'तलवा' (स्वाभिमान) घिसवा लेते हैं लेकिन उंगली (इज्ज़त) बचाए रखते हैं। प्रेमचंद ने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया, चाहे उनका जूता ही क्यों न फट गया हो।
प्रेमचंद की फोटो में दिख रही व्यंग्य मुस्कान उन लोगों पर है:
1. जो अपनी कमियों को छिपाने (पर्दा डालने) की कोशिश करते हैं।
2. जो अपनी अँगुली को ढकने की चिंता में अपना तलवा (भविष्य/आधार)
नष्ट कर रहे हैं।
3. जो मुसीबतों (टीलों) से बचकर निकलना चाहते हैं।
प्रश्न: हरिशंकर परसाई ने प्रेमचंद का जो शब्दचित्र
प्रस्तुत किया है, उससे प्रेमचंद के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ
उभरकर आती हैं?
उत्तर:
1. सादगी पसंद: वे बनावटी जीवन से दूर, सादा जीवन
जीते थे।
2. स्वाभिमानी: वे फटे जूते में फोटो खिंचाने में
शर्म महसूस नहीं करते थे।
3. संघर्षशील: उन्होंने सामाजिक बुराइयों से
समझौता नहीं किया, बल्कि उन्हें ठोकर मारी।
प्रश्न: "तुम पर्दे का महत्व ही नहीं जानते, हम
पर्दे पर कुर्बान हो रहे हैं।" - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर: यहाँ 'पर्दा' इज्ज़त छिपाने और दिखावे का
प्रतीक है। लोग अपनी बुराइयों और गरीबी को छिपाने के लिए सब कुछ
न्योछावर कर देते हैं। लेकिन प्रेमचंद जैसे महान लेखक के लिए बाहर और
भीतर कोई अंतर नहीं था। वे जैसे थे, वैसे ही दुनिया के सामने आते
थे।
• उपहास: मजाक उड़ाना (Mockery)
• बिसरना: भूल जाना
• आग्रह: निवेदन (Request)
• क्लेश: दुख/कष्ट
• तगादा: तकाजा (Payment reminder)