श्यामाचरण दुबे द्वारा लिखित बाज़ारवाद, विज्ञापन और बदलती जीवनशैली का विश्लेषण
'उपभोक्तावाद की संस्कृति' श्यामाचरण दुबे द्वारा लिखित एक विचारप्रधान निबंध है। इसमें लेखक ने बाज़ार की गिरफ्त में आ रहे समाज की वास्तविकता को प्रस्तुत किया है। आज हम विज्ञापनों की चमक-दमक के कारण वस्तुओं के पीछे भाग रहे हैं, चाहे उनकी हमें ज़रूरत हो या न हो।
पहले 'सुख' का अर्थ आत्मिक शांति और संतोष था। आज 'सुख' का अर्थ बदलकर 'उपभोग' (Consumption) हो गया है। लोग मानते हैं कि बाज़ार में उपलब्ध वस्तुओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना ही असली सुख है।
बाज़ार विलासिता (Luxury) की सामग्रियों से भरा पड़ा है। विज्ञापन
हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि अमुक वस्तु ही हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ
है।
उदाहरण के लिए टूथपेस्ट: कोई दाँतों को मोती जैसा
चमकाता है, कोई मसूड़ों को मज़बूत करता है, तो कोई ऋषि-मुनियों द्वारा
स्वीकृत है।
लेखक बताते हैं कि लोग ज़रूरत के लिए नहीं, बल्कि 'प्रतिष्ठा' (Status)
दिखाने के लिए चीज़ें खरीदते हैं:
• नहाने के साबुन का चुनाव फिल्म स्टार्स की पसंद के आधार पर होता
है।
• परफ्यूम और कीमती सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics) अमीरी का प्रतीक बन
गए हैं।
• म्यूजिक सिस्टम और कंप्यूटर घर में केवल दिखावे के लिए खरीदे जाते
हैं।
सांस्कृतिक अस्मिता का अर्थ है हमारी अपनी पहचान, परंपराएँ और मूल्य। उपभोक्तावाद के कारण हम पश्चिम (West) की अंधाधुंध नकल कर रहे हैं और अपनी सांस्कृतिक पहचान खोते जा रहे हैं। हम बौद्धिक दासता स्वीकार कर रहे हैं।
| पुराना समाज (वास्तविकता) | नया समाज (उपभोक्तावाद) |
|---|---|
| वस्तु की गुणवत्ता (Quality) महत्वपूर्ण थी। | वस्तु का विज्ञापन (Advertisement) महत्वपूर्ण है। |
| ज़रूरत के अनुसार खरीदारी। | प्रतिष्ठा (Status) दिखाने के लिए खरीदारी। |
| सादा जीवन, उच्च विचार। | अधिक से अधिक उपभोग ही सुख है। |
| सामाजिक संबंध मज़बूत थे। | व्यक्तिवाद (Individualism) बढ़ रहा है। |
लेखक चेतावनी देते हैं कि यह संस्कृति भारत के लिए एक बड़ा खतरा
है:
1. सीमित संसाधन: हमारे सीमित संसाधनों का घोर
अपव्यय हो रहा है।
2. सामाजिक दूरी: अमीर और गरीब के बीच की खाई चौड़ी
हो रही है।
3. अशांति: जीवन स्तर का यह अंतर समाज में आक्रोश
और अशांति पैदा कर रहा है।
4. मर्यादा भंग: नैतिक मूल्य कमजोर पड़ रहे हैं और
स्वार्थ बढ़ रहा है।
महात्मा गांधी ने कहा था:
"हम स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे-खिड़कियां
खुले रखें, पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें।"
अर्थात, हमें दूसरी संस्कृतियों से अच्छी बातें सीखनी चाहिए, लेकिन
उपभोक्तावाद की आंधी में अपनी जड़ों को नहीं छोड़ना चाहिए।
प्रश्न: लेखक के अनुसार 'जीवन में सुख' से क्या
अभिप्राय है?
उत्तर: लेखक के अनुसार आज के समय में 'सुख' की
परिभाषा बदल गई है। पहले आत्मिक संतोष ही सुख था, लेकिन अब
'उपभोग' का भोग करना (वस्तुओं का इस्तेमाल करना) ही सुख माना जाने
लगा है।
प्रश्न: 'प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे
हास्यास्पद ही क्यों न हों' - स्पष्ट करें।
उत्तर: लोग समाज में अपनी हैसियत दिखाने के लिए ऐसे
काम करते हैं जो कभी-कभी हंसी का पात्र बन जाते हैं। जैसे अमेरिका
में अपनी मृत्यु के बाद कब्र के आसपास हरियाली और संगीत का प्रबंध
करवाना। यह प्रतिष्ठा का एक झूठा और हास्यास्पद रूप है।
• वर्चस्व: दबदबा (Dominance)
• विज्ञापित: प्रचारित (Advertised)
• छद्म: बनावटी/नकली (Fake)
• अस्मिता: पहचान/अस्तित्व (Identity)
• अपव्यय: फिजूलखर्ची (Wastage)