🏔️ ल्हासा की ओर - कक्षा 9

राहुल सांकृत्यायन द्वारा रचित तिब्बत की रोमांचक यात्रा का वर्णन

1. लेखक परिचय एवं पाठ का सार

📖 परिचय (Introduction)

'ल्हासा की ओर' राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित एक यात्रा-वृत्तांत (Travelogue) है। लेखक ने 1929-30 में नेपाल के रास्ते तिब्बत की यात्रा की थी। उस समय भारतीयों को तिब्बत जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने यह यात्रा एक भिकमंगे (भिखारी) के वेश में की।

🌟 यात्रा का उद्देश्य

लेखक बौद्ध धर्म का अध्ययन करना चाहते थे और तिब्बत के दुर्गम रास्तों व वहाँ के सामाजिक जीवन को समझना चाहते थे। इस पाठ में तिब्बत की राजधानी 'ल्हासा' की ओर जाने वाले कठिन रास्तों का वर्णन है।

🔑 मुख्य पात्र (Key Characters)

  • लेखक (राहुल सांकृत्यायन): यात्रा करने वाला मुख्य यात्री।
  • सुमति (Sumati): लेखक का मित्र और मार्गदर्शक (Guide), जो एक मंगोल भिक्षु था।
  • तिब्बती समाज: वहाँ के आम लोग, यजमान और डाकू।

2. तिब्बत का सामाजिक जीवन

⚡ सामाजिक विशेषताएँ

उस समय के तिब्बती समाज में कई अच्छी बातें थीं:

1. जाति-पाति नहीं थी: छुआछूत जैसी कोई प्रथा नहीं थी।
2. पर्दा प्रथा का अभाव: औरतें पर्दा नहीं करती थीं।
3. अतिथि सत्कार: अपरिचित व्यक्ति भी घर के अंदर जा सकता था। घर की बहुएँ या सासुएँ यात्रियों के लिए चाय बना देती थीं।
4. चाय संस्कृति: वहाँ चाय में मक्खन और सोडा-नमक डाला जाता था।

2.1 ठहरने की व्यवस्था

💡 सुमति का प्रभाव

सुमति की जान-पहचान (यजमान) हर गाँव में थी। इसलिए, भिकमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को रहने के लिए अच्छी जगह मिली। लेकिन लौटते समय 'भद्र' (सभ्य) वेश में होने पर भी उन्हें अच्छी जगह नहीं मिली और उन्हें गरीब झोपड़े में रहना पड़ा।

3. यात्रा की कठिनाइयाँ

📖 डाँडा (Danda)

तिब्बत में 'डाँडा' सबसे खतरनाक जगहें थीं। ये 16-17 हज़ार फीट की ऊँचाई पर स्थित थीं। यहाँ मीलों तक कोई गाँव नहीं होता था। यह डाकुओं के लिए सबसे सुरक्षित जगह थी क्योंकि यहाँ खून करने पर भी कोई गवाह नहीं मिलता था।

⚡ डाकुओं का भय और बचने का तरीका

यहाँ डाकू पहले आदमी को मार देते थे, फिर देखते थे कि उसके पास पैसा है या नहीं।

बचने का तरीका: लेखक और सुमति जब भी किसी खतरनाक सी दिखने वाली जगह या व्यक्ति को देखते, तो वे अपनी टोपी उतारकर जीभ बाहर निकालते और "कुची-कुची" (दया-दया), एक पैसा! कहकर भीख माँगने लगते।

💡 घोड़े की समस्या

लंकोर की चढ़ाई के समय लेखक का घोड़ा बहुत सुस्त था। वह धीरे चलने लगा और लेखक अपने साथियों से पिछड़ गए। वे रास्ता भटक कर डेढ़-दो मील गलत रास्ते पर चले गए, जिससे सुमति को उनका बहुत इंतज़ार करना पड़ा और वह गुस्सा हो गए।

4. महत्वपूर्ण शब्द और स्थल

शब्द/स्थल अर्थ/विवरण
थोंगला तिब्बत सीमा का एक खतरनाक स्थान।
भीटा टीले के आकार का ऊँचा स्थान।
गंडा मंत्र पढ़कर गाँठ लगाया हुआ कपड़ा या धागा (ताबीज)।
भरिया भार ढोने वाला (कुली)।
सत्तू भुने हुए अन्न (जौ/चने) का आटा।

5. पाठ से सीख और निष्कर्ष

🔑 शेखर विहार और बौद्ध ग्रंथ

  • यात्रा के अंत में वे 'शेखर विहार' पहुँचे।
  • वहाँ एक भव्य बौद्ध मठ था।
  • वहाँ 'कंजुर' (बुद्धवचन अनुवाद) की 103 हस्तलिखित पोथियाँ रखी थीं।
  • एक-एक पोथी का वजन 15-15 सेर (लगभग 14 किलो) था।
  • लेखक उन किताबों को पढ़ने में रम गए।

🌟 निष्कर्ष (Conclusion)

यह पाठ हमें बताता है कि यात्रा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्ति का साधन भी है। इससे हमें दूसरे देशों की संस्कृति, जीवन शैली और कठिनाइयों का पता चलता है। राहुल जी की यह यात्रा साहस और ज्ञान की खोज का अद्भुत उदाहरण है।

6. अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)

💡 प्रश्न 1

प्रश्न: लेखक ने अपनी यात्रा भिकमंगे के वेश में क्यों की?

उत्तर: उस समय तिब्बत में भारतीयों को जाने की मनाही थी। चीनी पलटन वहाँ पहरा देती थी। इसलिए जान-माल की सुरक्षा और यात्रा को सफल बनाने के लिए लेखक को भिकमंगे का वेश धारण करना पड़ा।

💡 प्रश्न 2

प्रश्न: सुमति अपने यजमानों के पास क्यों जाना चाहते थे?

उत्तर: सुमति एक बौद्ध भिक्षु थे। वे अपने यजमानों को बोधगया से लाए गए 'गंडे' (ताबीज) बाँटने और उनसे दक्षिणा लेने के लिए उनके पास जाना चाहते थे।

📝 कठिन शब्दार्थ (Glossary)

डाँडा: ऊँची ज़मीन
कुची-कुची: दया-दया
छंड़: तिब्बती शराब
थुक्पा: सत्तू या चावल के साथ मूली/हड्डी वाला सूप
यजमान: जिसके घर अतिथि ठहरा हो (अतिथि सत्कारक)